जब भी रात में ट्रेन में सफर करता हूं तो एक मन में एक डर हमेशा रहता है कि सुबह सही सलामत अपनी मंजिल तक पहुंच पाऊंगा या नहीं। फिर सोचता हूं कि चलो जो होगा सो होगा। सुरक्षा के तमाम दावे किए जाते हैं रेलवे की ओर से। हर बजट में हादसों को रोकने के लिए ऩई तकनीक लाने की बात कही जाती है, लेकिन रेलवे ट्रैक पर अमल नहीं दिखा अभी तक । बुलेट ट्रेन अभी आने की बात ही हो रही है, लेकिन इससे पहले उन तकनीकों को सुधारने और खामियों को दूर करने और साथ ही रेलवे कर्मचारियों को नींद से जगाने की जरूरत है। लोगों की जेहन में आता होगा कि इतना बड़ा रेलवे है, छोटे-मोटे हादसे तो होते रहेंगे, लेकिन ये सोच क्यों? क्या ऐसी व्यवस्था नहीं बननी चाहिए जहां हादसों की कोई जगह न हो। रेलवे को सुधारने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश की जरूरत कही जाती है, लेकिन आखिर क्यों जिन ट्रेनों में चार महीने, एक महीने पहले सीट भर जाती है, मालगाड़ी भर-भरकर जाती हैं, उनके पास पैसों की कमी है। दरअसल दिक्कत रेलवे की आंतरिक व्यवस्था से शुरू हुई है। जिसे दूर करने की जरूरत है, और चुन-चुनकर घोटालेबाज अफसरों,कर्मचारियों को हटाने की जरूरत है, जिनकी वजह से रेलवे घाटे की पटरी पर दौड़ रही है। उम्मीद है कि दुनिया के दूसरे देशों से सबक लेते हुए मौजूदा सरकार कुछ ठोस उपाय करेगी।
Tuesday, August 4, 2015
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