Friday, April 3, 2009

अब आतंकी अमेरिका न जाए...


ज़रा सोचिए अगर किसी की मंशा बिना उसकी मेहनत के पूरी हो जाए तो उसे कैसा महसूस होता होगा। दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र अमेरिका के खिलाफ साजिश रचने और उसे बर्बाद करने वाले आतंकवादियों की मंशा भी घर बैठे-बैठे ही पूरी हो रही है....कैसे। दरअसल उन आतंकियों के बदले कोई और वहां खून की होली खेल रहे हैं। और वो हैं वहां के कुछ निराशा और कुंठा के शिकार लोग और छात्र....। 03 अप्रैल को न्यूयॉर्क के विंघमटन स्थित अमेरिकी सीविक एसोसिएशन सेंटर पर एक ऐसी ही घटना घटी, जिससे अमेरिका विरोधी आतंकी संगठनों को भारी राहत मिली है। दरअसल एक हमलावर ने इस सेंटर में घुस कर 13 लोगों को गोलियों से भून डाला और 41 लोगों को बंधक बना डाला था। हालांकि जैसा हमेशा से होता आया है ,उसने भी खुद को गोली मार ली। अमेरिका में जब से 9/11 की खौफनाक घटना घटी है उसके बाद वहां की सुरक्षा व्यवस्था इतनी चाक चौबंद कर दी गई है कोई बाहरी परिंदा पर भी नहीं मार सकता है ( हा हा हा हा....)। लेकिन वहां के निवासियों को पर फैलाने की पूरी आजादी... है या फिर दी गई है। इस हिंसक आजादी का अंदाजा पिछली कुछ घटनाओं से लगाया जा सकता है।
- 2 अक्टूबर 2006- अमरीका में पेंसिलवेनिया प्रांत के एक स्कूल में हुई गोलीबारी में 4 बच्चे मारे गए और 8 घायल .
- 16 अप्रैल 2007- अमरीकी विश्वविद्यालय में अंधाधुंध गोलीबारी, 32 मरे
- 7 अक्टूबर 2007- .विस्कोन्सिन प्रांत में बंदूकधारी ने 6 लोगों की हत्या की
- 14 फरवरी 2008- फिनलैंड में एक कॉलेज में एक छात्र ने अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर कम से कम 10 लोगों को मार डाला.
- 23 सितंबर 2008- फिनलैंड में एक कॉलेज में एक छात्र ने अंधाधुंध गोलियाँ चलाकर कम से कम 10 लोगों को मार डाला
- 11 मार्च 2009- अमेरीकी राज्य अलाबामा में एक बंदूकधारी की गोलियों से कम से कम नौ व्यक्तियों की मौत
- 03 अप्रैल 2009- .विंघमटन में बंदूकधारी ने 13 लोगों की हत्या की।

ये कुछ घटनाएं हैं, जिनमें किसी बाहरी शख्स या आतंकियों का हाथ नहीं था, बल्कि उसके अपने नागरिकों ने ही उसकी धरती को खून से लाल कर दिया है। इन घटनाओं के पीछे कारणों पर नज़र डाले तो कई कारण निकलते हैं। इनमें सबसे पहला कारण है अमेरिका में हथियार खरीदने की सरल नीति। अमेरिका में हथियार खरीदना बड़ा ही आसान है। साथ ही गन संस्कृति भी बहुत मशहूर है, वहां के फिल्मों, मैग्जीन, किताबों, टेलीविजन और गानों की एलबम में हथियार और उससे जुड़े विज्ञापन आसानी से देखे जा सकते हैं। अपनी सुरक्षा का हवाला देकर कोई भी अमेरिकी अग्नेयास्त्र तक खरीद सकता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका के 25 फीसदी युवाओं के पास बंदूक और पिस्तौल जैसे हथियार हैं। अमेरिका में हथियार को लेकर राजनीति भी बहुत हुई है, जिसे गन पॉलिटिक्स का नाम दिया गया है। अमेरिकी सर्वोच्च न्यायलय ने तो वहां एक केस के बाद आदेश दिया है कि हर एक व्यक्ति अपनी सुरक्षा के लिए हथियार रख सकता है। अब ऐसी परिस्थिति में अगर वहां का कोई भी व्यक्ति डिप्रेशन या कुंठा का शिकार होता है,तो वे हथियार चलाने से गुरेज नहीं करता है। इधर जब से मंदी हावी हुई है तब से युवाओं में डिप्रेशन और भी बढ़ गया है। शुक्रवार को हुए हादसे की शुरुआती जांच के बाद भी यही सामने आया है कि जिस व्यक्ति ने गोली चलाई उसे कुछ महीने पहले एक कंपनी ने मंदी का हवाला देकर निकाल दिया। अमेरिका में एक और बड़ा कारण है बच्चों का मां- बाप से कम उम्र में ही अलगाव, ये अलगाव अमेरिकी युवाओं को समय से पहले ज्यादा परिपक्व बना दे रहे हैं।
अब ओबामा सरकार को अफगानिस्तान, पाकिस्तान और इराक पर ध्यान कम करके अपने देश के युवाओं को एक नई सोच और दिशा देने की जरुरत है। साथ ही हथियार खरीद नीति में भी बदलाव करने की जरुरत है। नहीं तो अमेरिका को उसके अपने ही खून की होली से लाल करते रहेंगे।

Monday, March 30, 2009

आजतक बन गया पाकिस्तानी चैनल..!

तालिबान का तिलिस्म..... पाक का बटन किसके हाथ में?........पाक की सांप-सीढ़ी........कुछ ऐसे ही नाम आपको सबसे तेज़ चैनल के स्क्रीन पर ज़्यादा समय तक देखने को मिलते होंगे। तो इन्हें देखकर आप घबराइएगा नहीं और ना ही ये सोचेइएगा कि क्या ये सबसे तेज़ चैनल की मूर्खता तो नहीं...। दरअसल आजतक जिस हिसाब से पाकिस्तान से जुड़ी ख़बरें दिखाता है, उतना तो भारत का कोई दूसरा चैनल नहीं दिखाता। यहां तक की टाइम्स नाउ जोकि इंडिया का प्रतिष्ठित अंगरेज़ी न्यूज़ चैनल है, वो भी पाकिस्तान की ख़बरों को उतना तवज्जो से नहीं दिखाता। इसके बावजूद आजतक इन खबरों को इतनी गंभीरता से(या कहें बहुत ही ज्यादा) दिखाता है कि उसमें भारत की ख़बरें दब सी जातीं हैं। चाहे वो सुबह का बुलेटिन हो..या फिर दोपहर का बुलेटिन..या फिर रात नौ बजे का प्राइम टाइम बुलेटिन... ज्यादातार बुलेटिन में, जरदारी, नवाज, मुशर्रफ या फिर कियानी की खबर...। इतनी ज्यादा खबर तो आजतक वाले हर रोज सोनिया गांधी, लालकृष्ण आडवाणी, सचिन तेंदुलकर, सानिया मिर्जा या फिर शाहरुख खान की भी नहीं दिखाते होंगे। शायद आजतक वालों का मानसिक दिवालियापन दिन ब दिन बढ़ रहा है या फिर वाकई वो भारतीय चैनल से पाकिस्तानी चैनल की बनने की फिराक में हैं.....। भारत में न्यूज़ चैनलों की बाढ़ सा आ गई है। राष्ट्रीय स्तर पर इतने ढेर सारे चैनल हैं कि आजतक प्रतिस्पर्धा से घबरा गया होगा। तभी पाक..पाक और सिर्फ पाक...। या फिर तालिबान या अलकायदा....। भईया आज तक को देखने पर ऐसा लगता है मानो ये चैनल भारतीयों के लिए नहीं पाकिस्तानी और तालिबानी लोगों के लिए चलाया जा रहा है।

डिस्केलमर- मैं आजतक के खिलाफ नहीं हूं। अगर कोई एक आम आदमी जो न्यूज चैनल देखता है उससे आज तक के विषय में पूछा जाए तो वो बता सकता है कि इस चैनल पर पाकिस्तान और तालिबान को लेकर कितनी खिचड़ी पकाई जाती है।

Thursday, March 19, 2009

हाय रे जुबान…!


एक बार फिर जुबान का खेल शुरू हो गया है। शब्दों का भंवर जाल है...या फिर जाल में फंसाने के लिए शब्द है। सबकी समझ से परे हैं नेताओं की जुबान... और जुबान से निकले शब्द...। इनकी जुबान कभी जुर्रत भी करती है...कभी कड़वा भी बोलती है..तो कभी-कभी किसी का महिमामंडन भी करती है। ऐसी ही जुबान से निकले कुछ शब्द आपने और हमने सुने होंगे उन दो नेताओं के मुखारबिंदु से जिनमें से एक तो अपनी जमीन बनाने की कोशिश में है..तो दूसरा..या कहें दूसरी जुबान है उस नेता की जो अपनी खोई जमीन वापस तलाश रही है। हम बात कर रहें हैं..स्व. संजय गांधी के पुत्र और पीलीभीत से बीजेपी के लोकसभा उम्मीदवार वरुण गांधी का और बीजेपी की पूर्व नेता उमा भारती का। सबसे पहले बात नेहरु-गांधी परिवार के लाल की। कहने को तो वरुण गांधी नेहरु-गांधी परिवार के वारिस हैं, लेकिन उनकी जुबान से ऐसा बिल्कुल नहीं लगता है। पिछले दिनों पीलीभीत में अपने भड़काऊ और गैरमर्यादित बयानों से उन्होंने राजनीतिक गलियारों में तो हलचल पैदा की है..साथ ही ये सोचने पर भी मजबूर कर दिया कि क्या वाकई पारिवारिक परवरिश कभी-कभी धोखा दे जाती है। वरुण की मां मेनका गांधी जो जानवरों को एक छोटी सी तकलीफ होने पर पहाड़ खड़ा कर देती हैं क्या उनके लिए इंसान(जिनके खिलाफ वरूण गांधी ने भाषण दिया) इंसान नहीं है..। वरुण ने एक बार फिर दिल्ली में अपनी जुबान को बदला और कहा कि जो सीडी में जुबान बोली गई वो उनकी जुबान नहीं थी। अब क्या करें स जुबान को जो बात निकल गई वो वापस थोड़ी ही आ सकती है...अब बात एक साध्वी की.. ये साध्वी भी गाहे-बगाहे अपनी जुबान का परिचय देती रही हैं...। उमा भारती की जुबान उस समय आपने सुनी होगी,जब उन्होंने लौह पुरूष(भाजपा के) को भरी सभा में खरी खोटी सुनाई थी और बीजेपी छोड़कर नई बीजेपी( भारतीय जनशक्ति पार्टी बनाई थी)। उमाजी की जुबान बीच-बीच में भी बीजेपी के पदाधिकारियों को कोसती रही है। लेकिन अब चुनावी मौसम शुरु हो गए हैं..ऐसे में इस साध्वी की जुबान बिल्कुल बदल गई है। अब यही जुबान आडवाणी को अब पिता और बीजेपी अध्यक्ष राजनाथ सिंह को भाई कहकर संबोधन कर रही है। शायद उमा की जुबान समझ चुकी है कि अगर राजनीति में रहना है.तो जुबान का सही समय पर इस्तेमाल करो। ऐसा नहीं है कि सिर्फ बीजेपी वालों की जुबान में अच्छाई या बुराई है..ये तो राजनीति का फसाना है कि चुनाव नजदीक आते ही सफेदपोशों की जुबान हर उस दिशा में भागती है, जिधर फायदा होता है। कभी-कभी फायदा नुकसान बन जाता है(वरुण गांधी उदाहरण हैं)। जैसे-जैसे लोकतंत्र का पर्व नजदीक आएगा और न जाने कितनी जुबानें फिसलेंगी और यही जुबान वादों का पिटारा खोलेगी। लेकिन जनता की जुबान क्या बोलेगी और किसकी जुबान बंद करेगी ये तो 16 मई( वोटों की गिनती का दिन) ही पता चलेगा......