
भागो भईया...हवा खराब है...
हवा-हवाई कंपनियों के लिए मंदी के बाद से यही स्थिति है। भागो भईया...हवा खराब है..वाली स्थिति। अमेरिका की एक से एक बढ़कर एक धुरंधर कंपनियां, जिन्होंने बेहद ही जोर-शोर और धमाकेदार तरीके से अपना एक्सपेंशन किया, हजारों-लाखों को रोजगार दिया, दनादन एक देश से दूसरे देश, दूसरे से तीसरे और तीसरे से न जाने कहां-कहां अपने ऑफिस खोले। अमेरिकी कैपटलिज्म के देश-दुनिया में फैलाया। आज वहीं आर्थिक हवा खराब होने पर कह रही हैं..भागो भईया..हवा खराब है...। या ये भाग नहीं रही हैं, तो अपने कर्मचारियों को भगा रही है। जनता बड़ी ही भोली होती है.. चाहे भारतीय हो या फिर अमेरिकी...सब चक्कर में पड़कर घनचक्कर बन जाती हैं। और बने भी क्यों ने पापी पेट और लाइफस्टाइल का जो सवाल हैं। अमेरिका में अक्टूबर में जहां 2 लाख 40 हज़ार की नौकरी गई तो नवंबर में 13 साल का रिकॉर्ड टूट गया और कुल 5 लाख 33 हज़ार लोग मंदी इफेक्ट बेरोजगार बन गए। वहां नौकरियों में छंटनी का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है, सिटी बैंक. फोर्ट मोटर, गोल्डमैन साक्स और न जाने-जाने कौन-कौन सी कंपनी थोक भाव में कर्मचारियों को नमस्ते कहते जा रही हैं। बुश साहब.. आपकी नौकरी नहीं जा रही है.. इसकी खुशी मनाइए..। ऑटो सेक्टर भी मंदी की मार झेल रहा है.. कर्मचारियों को नमस्ते कहने का मन तो बनाए है, लेकिन सरकारी पेंशन का इंतजार कर रहा है। अमेरिकी सरकार उनके लिए भी बेल आउट का इंतजाम करने की कोशिश कर रही है। अमेरिकी सब प्राइम संकट ने पूरी दुनिया की हवा खराब कर दी.. कंपनियों की हवा खरीब कर दी है। भारत में भी हवा की खराबी का असर पड़ा है। निर्यात रुकने से 65 हजार(सरकारी आंकड़ा असल में पता नहीं कितने) कामगारों की नौकरी चली गई। बेचारे नए एमबीए वाले, नए एमसीए और एन सॉफ्टवेयर इंजीनियर इनके लिए आगे क्या है.. क्या नहीं है..ये खुद नहीं जानते। आईआईटी, आईआईएम वाले ज्यादा दुःखी नहीं है.. क्योंकि उनका हिसाब-किताब कहीं न कहीं तो बैठना ही है...। लेकिन थोड़ी बहुत मार तो इन पर भी पड़ी है। इस बार आईआईटी दिल्ली में जितनी कंपनियां प्लेसमेंट करने आई उनमें फाइनेंस, मार्केटिंग, इंश्योरेंस, ऑटो और रीयल एस्टेट जैसी कंपनियां तो पहुंची नहीं। लेकिन अमेरिकी मंदी से इन कंपनियों की हवा न खराब हो इसके लिए सरकार ने बूस्टर पैकेज वाले नॉब को दबा दिया है। अब भारत में आगे आने वाले दिनों में कैसा माहौल रहता है ये देखना होगा।
हवा-हवाई कंपनियों के लिए मंदी के बाद से यही स्थिति है। भागो भईया...हवा खराब है..वाली स्थिति। अमेरिका की एक से एक बढ़कर एक धुरंधर कंपनियां, जिन्होंने बेहद ही जोर-शोर और धमाकेदार तरीके से अपना एक्सपेंशन किया, हजारों-लाखों को रोजगार दिया, दनादन एक देश से दूसरे देश, दूसरे से तीसरे और तीसरे से न जाने कहां-कहां अपने ऑफिस खोले। अमेरिकी कैपटलिज्म के देश-दुनिया में फैलाया। आज वहीं आर्थिक हवा खराब होने पर कह रही हैं..भागो भईया..हवा खराब है...। या ये भाग नहीं रही हैं, तो अपने कर्मचारियों को भगा रही है। जनता बड़ी ही भोली होती है.. चाहे भारतीय हो या फिर अमेरिकी...सब चक्कर में पड़कर घनचक्कर बन जाती हैं। और बने भी क्यों ने पापी पेट और लाइफस्टाइल का जो सवाल हैं। अमेरिका में अक्टूबर में जहां 2 लाख 40 हज़ार की नौकरी गई तो नवंबर में 13 साल का रिकॉर्ड टूट गया और कुल 5 लाख 33 हज़ार लोग मंदी इफेक्ट बेरोजगार बन गए। वहां नौकरियों में छंटनी का सिलसिला थमता नहीं दिख रहा है, सिटी बैंक. फोर्ट मोटर, गोल्डमैन साक्स और न जाने-जाने कौन-कौन सी कंपनी थोक भाव में कर्मचारियों को नमस्ते कहते जा रही हैं। बुश साहब.. आपकी नौकरी नहीं जा रही है.. इसकी खुशी मनाइए..। ऑटो सेक्टर भी मंदी की मार झेल रहा है.. कर्मचारियों को नमस्ते कहने का मन तो बनाए है, लेकिन सरकारी पेंशन का इंतजार कर रहा है। अमेरिकी सरकार उनके लिए भी बेल आउट का इंतजाम करने की कोशिश कर रही है। अमेरिकी सब प्राइम संकट ने पूरी दुनिया की हवा खराब कर दी.. कंपनियों की हवा खरीब कर दी है। भारत में भी हवा की खराबी का असर पड़ा है। निर्यात रुकने से 65 हजार(सरकारी आंकड़ा असल में पता नहीं कितने) कामगारों की नौकरी चली गई। बेचारे नए एमबीए वाले, नए एमसीए और एन सॉफ्टवेयर इंजीनियर इनके लिए आगे क्या है.. क्या नहीं है..ये खुद नहीं जानते। आईआईटी, आईआईएम वाले ज्यादा दुःखी नहीं है.. क्योंकि उनका हिसाब-किताब कहीं न कहीं तो बैठना ही है...। लेकिन थोड़ी बहुत मार तो इन पर भी पड़ी है। इस बार आईआईटी दिल्ली में जितनी कंपनियां प्लेसमेंट करने आई उनमें फाइनेंस, मार्केटिंग, इंश्योरेंस, ऑटो और रीयल एस्टेट जैसी कंपनियां तो पहुंची नहीं। लेकिन अमेरिकी मंदी से इन कंपनियों की हवा न खराब हो इसके लिए सरकार ने बूस्टर पैकेज वाले नॉब को दबा दिया है। अब भारत में आगे आने वाले दिनों में कैसा माहौल रहता है ये देखना होगा।

1 comment:
its really true...in context of global economy. waise bhi, jab aarthik mahashakti ghutne tekta hai to hawaon ko bhi bahakne ka mauka mil jata hai...fir Manmohan ne economy ko full speed dene ke liye top gear lagaya....lekin gaddi me petrol rahe tab na.....
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